Rajsthan RSS History: वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का जो व्यापक प्रभाव दिखाई देता है, उसकी नींव दशकों पहले उन तपस्वी प्रचारकों ने रखी थी जिन्होंने अपना सर्वस्व होम कर दिया। राजस्थान में संघ कार्य खड़ा करने का श्रेय ऐसे ही एक बीज-रूपी साधक, श्री विश्वनाथ जी लिमये को जाता है, जिन्हें 1941 में द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने यहाँ भेजा था।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि राजस्थान में संघ की प्रारंभिक जड़ों में स्थानीय संस्कृति और लोक आस्था का गहरा जुड़ाव रहा है। इसका एक प्रमाण अजमेर में संघ की शुरुआती शाखाओं के नामों में मिलता है, जहाँ एक शाखा का नाम राजस्थान के प्रमुख लोक देवता वीर तेजाजी के नाम पर रखा गया था।
विकट परिस्थितियों में शुरुआत 1941 में जब विश्वनाथ जी लिमये अजमेर पहुंचे, तो परिस्थितियां अत्यंत विकट थीं। प्रदेश अलग-अलग रियासतों में बंटा था और ब्रिटिश शासन का कड़ा पहरा था। कड़ाके की सर्दी में एक हलवाई की भट्ठी के पास रात गुजारने वाले लिमये जी ने अथक प्रयासों के बाद आनासागर स्थित ‘ऋषिउद्यान’ (अखाड़े) के युवकों से संपर्क साधा और ‘चंद्रकुण्ड’ स्थान पर राजस्थान की पहली विधिवत शाखा प्रारंभ की।
‘तेजाजी’ नाम से नई शाखा का उदय दस्तावेजों के अनुसार, अजमेर में संघ कार्य को विस्तारित करने के क्रम में लोक देवता तेजाजी का नाम भी जुड़ा। जब अजमेर की पहली शाखा ‘चंद्रकुण्ड शाखा’ व्यवस्थित रूप से चलने लगी, उसके तुरंत बाद विश्वनाथ जी लिमये ने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाया।
उन्होंने एक नई शाखा प्रारंभ की और उसका नाम ‘तेजाजी’ रखा। यह इस बात का परिचायक था कि संघ का कार्य स्थानीय जनमानस की श्रद्धा के केंद्रों के साथ जुड़कर आगे बढ़ रहा था।
स्थानीय कार्यकर्ताओं ने संभाली कमान इस ‘तेजाजी’ शाखा को सुचारू रूप से चलाने का जिम्मा स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उठाया। मोहल्ले के चंद्रदेव मास्टर इस शाखा के प्रथम मुख्य शिक्षक बने। बाद के समय में एक अन्य उत्साही युवक, जुगल किशोर खंडेलवाल को इस ऐतिहासिक शाखा का मुख्य शिक्षक बनाया गया।
यह घटना दर्शाती है कि 1940 के दशक के शुरुआती दौर में, जब राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) में संघ अपने शैशवकाल में था, तब लोक देवताओं के नाम और स्थानीय संस्कृति को आत्मसात करते हुए ही संगठन की नींव मजबूत की गई थी।
स्रोत संदर्भ: यह आलेख राजस्थान के प्रचारकों की जीवन गाथा पर केंद्रित पुस्तक ‘औऱ यह जीवन समर्पित…’ में वर्णित तथ्यों और वरिष्ठ प्रचारक शंकर लाल जी के संस्मरणों पर आधारित है।

