जयपुर राजस्थान रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA), जयपुर ने घर खरीदारों के हक में एक ऐतिहासिक और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। रेरा ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर ने प्रोजेक्ट पर लोन लिया है और वह उसे चुकाने में विफल रहता है, तो उस कर्ज की वसूली उन फ्लैट्स से नहीं की जा सकती जो पहले ही ग्राहकों को आवंटित किए जा चुके हैं।
एवलोन रॉयल पार्क मामला: क्या थी धोखाधड़ी?
यह पूरा मामला भिवाड़ी स्थित ‘एवलोन रॉयल पार्क’ प्रोजेक्ट से जुड़ा है। अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल के अनुसार, बिल्डर कंपनी मैसर्स जीआरजे डिस्ट्रीब्यूटर्स व डेवलपर्स ने साल 2012 में इस आवासीय प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी।
- भारी वसूली: बिल्डर ने 700 से ज्यादा फ्लैट्स बेचकर आवंटियों से लगभग ₹300 करोड़ रुपये वसूले।
- अधूरा काम: प्रोजेक्ट का निर्माण 2017 तक पूरा होना था, लेकिन आज भी ज्यादातर बिल्डिंग केवल ढांचा मात्र हैं।
- गुपचुप तरीके से लिया लोन: बिल्डर ने साल 2018 में पूरे प्रोजेक्ट को ‘ईसीएल फाइनेंस’ के पास ₹50 करोड़ में गिरवी रखकर लोन उठा लिया और उसे चुकाया नहीं।
रेरा की सख्त टिप्पणी और आदेश
रेरा की अध्यक्ष वीनू गुप्ता ने ‘एवलोन रॉयल पार्क होम बायर्स एसोसिएशन’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिल्डर की चालाकी को विफल कर दिया। बिल्डर कंपनी ने तर्क दिया था कि चूंकि मामला एनसीएलटी (NCLT) दिल्ली में दिवालिया कानून के तहत चल रहा है, इसलिए रेरा में आवंटियों की कार्यवाही खत्म की जानी चाहिए।
अथॉरिटी ने इस तर्क को खारिज करते हुए माना कि जमीन मालिक और बिल्डर शुरू से ही इस प्रोजेक्ट में सहभागी रहे हैं। रेरा ने आदेश दिया कि आवंटियों के अधिकार सबसे ऊपर हैं और उनके द्वारा खरीदे गए फ्लैट्स से बिल्डर के निजी कर्ज की वसूली अवैध है।
निदेशकों पर गिर सकती है गाज
इस फैसले के बाद अब रेरा बिल्डर कंपनी के निदेशकों और भू-स्वामी के खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है। इस निर्णय से प्रदेश के उन हजारों घर खरीदारों को बड़ी राहत मिली है जो बिल्डर और बैंकों के बीच कर्ज की लड़ाई में पिस रहे थे।
