जयपुर | गुलाबी नगरी के सांस्कृतिक केंद्र जवाहर कला केन्द्र (JKK) का शिल्पग्राम शुक्रवार को राजस्थान की सतरंगी लोक संस्कृति के रंगों में सराबोर हो गया। मौका था अखिल भारतीय संस्कार भारती और राजस्थान पर्यटन, कला एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय भव्य उत्सव ‘लोक रंग से उजास: कला संगम-2026’ के शुभारंभ का। 20 फरवरी को हुए इस रंगारंग आगाज ने पहले ही दिन दर्शकों को मरुधरा की माटी की सौंधी खुशबू और कलात्मक विरासत से रूबरू करवाया।

कार्यक्रम की शुरुआत मांगलिक वंदना और कलाकारों के समवेत स्वरों के साथ हुई, जिसने शिल्पग्राम के माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंच पर हण्डु पहलवान और जगत सिंह सुंदरावली ने जब ‘गौ-महिमा’ और कृष्ण भजनों की स्वरलहरियां छेड़ीं, तो वहां मौजूद हर श्रोता भक्ति भाव में डूब गया। इसके तुरंत बाद डीग से आए विष्णु शर्मा और उनके दल ने ब्रज की प्रसिद्ध ‘फूलों की होली’ और ‘चरकुला नृत्य’ प्रस्तुत कर फाल्गुनी बयार बहा दी। महुआ के श्री कृष्ण गुर्जर एंड पार्टी के ‘लांगुरिया’ गीतों और जगत सिंह के ‘बम रसिया’ की थाप पर दर्शक खुद को थिरकने से नहीं रोक पाए। वहीं, गफरूद्दीन के भपंग वादन और तेज सिंह इसरोली के दल द्वारा प्रस्तुत ‘भजन जिकड़ी’ व ‘मयूर नृत्य’ ने राजस्थानी लोक कला की विविधता का शानदार प्रदर्शन किया।

हस्तशिल्प, चित्रकारी और साहित्य का अनूठा संगम
शिल्पग्राम के इस मेले में केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की ही धूम नहीं है, बल्कि यह कला और साहित्य का भी एक अनूठा संगम बन गया है। लोक कला संगम में हस्तशिल्प कला (Handicrafts) और चित्रकारी (Painting) की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है, जो आगंतुकों को राजस्थान की हुनरमंद विरासत से परिचित करा रही है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए आयुर्वेद के स्टॉल्स भी उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, साहित्य प्रेमियों के लिए ‘ज्ञान गंगा प्रकाशन’ की ओर से विशेष पुस्तक स्टॉल्स लगाई गई हैं, जहां पाठक ज्ञानवर्धक और साहित्यिक पुस्तकों का लाभ उठा रहे हैं।



मनोरंजन के साथ-साथ यह उत्सव बौद्धिक विमर्श का भी केंद्र बना। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के समानांतर आयोजित ‘लोक चौपाल’ में नई पीढ़ी को लोक जीवन की वैज्ञानिकता से जोड़ने का प्रयास किया गया। मुख्य संयोजक निधीश गोयल ने ‘लोक’ और अंग्रेजी शब्द ‘Folk’ के बीच के सूक्ष्म दार्शनिक अंतर को स्पष्ट करते हुए भारतीय दृष्टि को परिभाषित किया। प्रथम सत्र में डॉ. इंदु शेखर ‘तत्पुरुष’, डॉ. विवेक भटनागर और डॉ. तनुजा सिंह ने भारतीय लोक दृष्टि पर गहन विचार साझा किए। वहीं, दूसरे सत्र में नारायण सिंह राठौड़ ‘पीथल’, डॉ. गीता सामोर और तनेराज सिंह सोढ़ा ने लोक परंपराओं में छिपे पर्यावरण संरक्षण, नारी विमर्श और जीवन प्रबंधन के सूत्रों को उजागर किया। रेणु श्रीवास्तव और सोहनपाल शर्मा ने अपने सधे हुए संचालन से कार्यक्रम को गति दी। आयोजकों के अनुसार, यह उत्सव 22 फरवरी तक जारी रहेगा, जिसमें आने वाले दो दिनों में प्रदेश की कई अन्य लुप्तप्राय कलाओं का प्रदर्शन होगा।
