BIHAR: राज्य बिहार के जिले गया में फाल्गू नदी किनारे स्थिति बोधगया है। यह जिला भारत में ही नहीं वल्कि दुनिया भर में काफी मशहूर है। पितृपक्ष के दौरान यहां काफी भीड़ होती है। यहां पितृपक्ष मेला भी लगता है।

बिहार में फाल्गू नदी किनारे स्थिति बोधगया का स्थापित है। यह पितृपक्ष आते ही बोधगया का अलग ही माहौल बन जाता है। इस दौरान यहां पूरे भारत से लोग श्राद्ध के दौरान पिंडदान करने आते हैं। पितृपक्ष के दौरान यहां काफी उमड़ी भीड़ लग जाती है। आपको बता दें कि बोधगया में पितृपक्ष मेला भी लगता है। इसके अलावा बोधगया को भगवान गौतम बुद्ध के कारण भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर बोधिवृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध ने साधना करते हुए ज्ञान की प्राप्ति की थी। जिसके चलते बौद्ध धर्म के लिए यह स्थान काफी महत्व रखता है।

आइए तो जानते हैं कि बोधगया में किन – किन स्थलों देखा जा सकता है।

महाबोधि मंदिर: यह मंदिर बोधगया का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर परिसर में बोधिवृक्ष है, जहां पर भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान की प्रप्ति की थी। गौतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद इस मंदिर का निर्माण राजा अशोक ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की बहुत बड़ी मूर्ति स्थापित की गई है।

Archaeology Museum: बोधगया जाएं तो आप अर्कियॉलजी म्यूजियम जाना न भूलें। इस म्यूजियम में महाबोधि पेड़ के चारों ओर लगने वाली असली रेलिंग रखी है।

Tibetan monastery: महाबोधि मंदिर के पास में ही तिब्बतियन मठ स्थित है। तिब्‍बतियन मठ बोधगया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा मठ है।

4 घटनाएं जिससे बदल गया गौतम बुद्ध का जीवन

भगवान बुद्ध का जीवन और उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। बुद्ध के प्रेरणादायक जीवनदर्शन का जन-जीवन पर अमिट प्रभाव रहा है।

आइए जानते हैं वे कौन-सी चार छटनाएं थी, जो सिद्धार्थ को संसार में बांधकर न रख सकीं, आइए जानें…

  1. वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दांत टूट हुए थे। बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा-मेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे कांपता हुआ वह सड़क पर चल रहे थे
  2. दूसरी बार सिद्धार्थ कुमार जब बगीचे की सैर पर निकले, तो उनकी आंखों के आगे एक रोगी अचानक से आ गया। उसकी सांस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बांहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहे थे।
  3. तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, तो कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया।
  4. चौथी बार सिद्धार्थ बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया।

उन्होंने सोचा- ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है।

क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य? उन्हें प्रसन्नचित्त संन्यासी ने आकृष्ट किया और वे संसार के मोह-बंधन से मुक्त होकर त्याग के रास्ते पर निकल गए और घोर तपस्या करके बुद्धत्व को प्राप्त किया।


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