कोरोना वायरस की महामारी ने सारी दुनिया में कोहराम मचा रखा है । ऐसे में रोजी रोटी के लिए घर से दूर गये मजदूर परेशान होकर वापस अपने घर की ओर लौट रहे हैं । गरीब मजदूरों की स्थिती पर लेखक आशीष मिश्रा(Ashish Mishra) ने लिखी एक कविता ।

एक ज़िम्मेदारी दूं ?
तुम कहो तो, गांवों को
दूध शिवाले से बचाकर
धोना अभागे पांवों को

पांव वो जो नंगे चलकर
धूप सहकर आ गए
पांव वो जो भूखे थे
अपने ही छाले खा गए

पांव वो जो घाव का
दर्दीला दरिया पी गए
पांव वो जो मर गए
वो पांव भी जो जी गए

कपड़े में बर्फ लपेट कर
नम करना नीमिया छावों को
दूध शिवाले से बचाकर
धोना अभागे पावों को

बेदर्द था मेरा शहर
वो पांव ना ठहरा सका
मीलों मील फैलकर भी
ज़रा सा ना गहरा सका

मुझपर भी दोष आएगा
ईश्वर को रोष आएगा
न्याय कब तक सोएगा
कभी तो होश आएगा

मैं हाथ जोड़कर कहता हूं
रख ताक पर सब दावों को
दूध शिवाले से बचाकर
धोना अभागे पांवों को

Writer – Ashish Mishra

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