मैं किसान हूं – हिंदी कविता

कोई उसकी भी सुन लो
कोई उसकी भी सुन लो
मेहनत है करता
ईमान बेच कर खाने की आदत नहीं
कोई उसकी भी सुन लो
मेहनत करता है तेज धूप में
छाव को परहेज है करता
कोई उसकी भी सुन लो
समझो मैं किसान हूं कोई मुझे भी समझो…..
है सरकार
है सरकार
रात को चैन नहीं
दिन को बैचैन हू
सरकार तेरे प्रशासन से मन्न अशांत है
धूप की बोछहार को
कोई छू के तो समझो
है सरकार
कोई उसकी भी सुन लों
कोई उसकी भी सुन लो
अनं दाता हूं अनाथ ना समझो
मेरी फसल को फासला ना समझो
कोई मेरी भी सुन लो
कोई मेरी भी सुन लो
मार के सपने सारे
करता हूं मेहनत
इस मेहनत को शोक में न बदलो
कोई उसकी भी सुन लो
कोई उसकी भी सुन लो
मै किसान हू कोई मुझे भी समझो
कोई मुझे भी समझो

लेखक :
महावीर नागर मुंडला
खानपुर /झालावाड़/राजस्थान

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