ये संकट राजस्थान की राजनीति का ही नहीं है। असल संकट कांग्रेस आलाकमान का है। बड़ी बेशर्मी से कांग्रेस भाजपा पर आरोप लगाती है कि उसने गोवा, कर्नाटक, मणिपुर, महाराष्ट्र, असम, मध्यप्रदेश और अब राजस्थान में खरीद फ़रोख़्त की। बड़ी बात ये है कि जो बिकने को तैयार हो, खरीदा उसे ही जा सकता है, क्या तमाम राज्यों में कांग्रेस के नेता बिकने के लिए तैयार रहते हैं। एक तरफ वो कहते हैं कि इंसान नहीं बिका करते हैं, दूसरी तरफ वो कहते हैं कि बकरा मंडी के बकरों की तरह भाजपा विधायकों की खरीदारी करती है, तीसरी तरफ वो एक ही महीने में दो बार अपने समर्थकों की बाड़ाबंदी करते हैं। वे ये बताएं कि बाड़े में इंसान रहते हैं या भेड़-बकरियां?
खैर, कपिल सिब्बल ने कहा था कि घोड़े अस्तबल यानी बाड़े से उछल जाएंगे क्या हम तब जागेंगे ? अपने ही आलाकमान पर ये कितना बड़ा आरोप है। क्या सोनिया गांधी सो रही हैं, क्या उन्हें ये सब दिखाई नहीं देता, क्या उन्हें राजनीति की समझ नहीं है, क्या वे तालमेल नहीं कर पा रही हैं, राजस्थान ऐसे संकट से गुज़र रहा है, और राहुल गांधी एलएसी को लेकर ट्वीट करते रहे, कोरोना ग्राफ पर ट्वीट करते रहे। अनुभवहीन प्रियंका इस मामले को सुलझा रही हैं, यानी आलाकमान में ही एकजुटता नहीं है, संकट के दौर में बड़े फैसले कौन करता है, इसकी किसी को जानकारी नहीं है, ये हाल अभी से नहीं है, कांग्रेस 2014 के बाद से वाकई शीर्ष स्तर पर खोखली हो चुकी है।
हो सकता है राहुल गांधी के मन में भी वही दर्द हो जो सचिन पायलट के मन मे है। सचिन तो अपनी बात आलाकमान से कह सकते हैं, अपनी पार्टी बना सकते हैं, भाजपा जॉइन कर सकते हैं, पर राहुल गांधी क्या करें ? वे देश के सबसे बुजुर्ग युवा हैं, न राजनीति में सफल हो पा रहे हैं, न किसी बिजनेस में सेटल हो पाए। बेरोजगार हैं, कांग्रेस अध्यक्ष पद भी छीन लिया गया।
और अब निश्चित तौर पर अगर राजस्थान में सरकार गिरी, या फिर अशोक गहलोत ने अपनी पूरी ताकत दिखा दी तो गांधी परिवार को अपनी सियासी दुकान समेट कर निकलना पड़ेगा।
कांग्रेस को अगर अगले लोकसभा चुनाव में जाना है, तो आलाकमान के स्तर पर बदलाव करना होगा। शीर्ष स्तर के 20 नेताओं को रिटायर करने की दरकार है, सोनिया और राहुल समेत।

– आशीष मिश्रा ( Ashish Mishra), Jaipur

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